जून के महीने में यूरोप का मौसम आमतौर पर सुहाना माना जाता है, लेकिन इस बार फ्रांस में जो हुआ उसने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया। 17 जून से 2 जुलाई के बीच सिर्फ 16 दिनों के भीतर फ्रांस में 5,764 अतिरिक्त लोगों की जान चली गई। यह आंकड़ा सिर्फ एक सरकारी रिपोर्ट नहीं है, बल्कि जलवायु परिवर्तन की उस कड़वी हकीकत का सबूत है जिससे हम अब तक मुंह मोड़ते आ रहे थे।
फ्रांस की राष्ट्रीय स्वास्थ्य एजेंसी 'सांते पब्लिक फ्रांस' (Santé publique France) के हालिया आंकड़े चौंकाने वाले हैं। 1947 में तापमान के आंकड़े दर्ज करने की शुरुआत के बाद से इस साल जून का महीना देश के इतिहास में सबसे गर्म दर्ज किया गया। पारा 40 डिग्री सेल्सियस के पार चला गया और पेरिस जैसे शहरों में जहां अधिकांश घरों में एयर कंडीशनर नहीं होते, वहां लोग अपने ही घरों में घुटने लगे। Also making waves lately: Why Tinkering With The Pension Triple Lock Is Pure Political Suicide.
वर्ष 2003 के बाद की सबसे भयानक त्रासदी
फ्रांस ने साल 2003 में एक विनाशकारी हीटवेव देखी थी, जिसमें लगभग 15,000 लोगों की मौत हुई थी। तब से सरकार ने कई अलर्ट सिस्टम बनाए और स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधारा, लेकिन इस बार की गर्मी ने उन तमाम तैयारियों को धत्ता बता दिया। 2003 के बाद किसी भी हीटवेव के दौरान यह अब तक की सबसे अधिक मौतों का आंकड़ा है।
आंकड़ों पर गौर करें तो इस 16 दिन की अवधि में प्रभावित इलाकों में कुल 21,674 मौतें दर्ज की गईं, जबकि सामान्य परिस्थितियों में यह आंकड़ा करीब 15,910 होना चाहिए था। यानी सामान्य से 36 प्रतिशत अधिक मौतें। Additional information regarding the matter are explored by The Washington Post.
तीन दिनों में ही हुआ सबसे बड़ा नुकसान
सबसे डराने वाली बात यह है कि इन 5,764 मौतों में से आधी मौतें सिर्फ तीन दिनों (25 जून से 27 जून) के दौरान हुईं। इन तीन दिनों में तापमान ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए।
बुजुर्गों पर इसका सबसे बुरा असर पड़ा। कुल मौतों में से लगभग दो-तिहाई लोग 75 वर्ष या उससे अधिक उम्र के थे। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती। 45 से 64 वर्ष के लोगों की मृत्यु दर में भी अभूतपूर्व बढ़ोतरी देखी गई। यानी भीषण गर्मी अब केवल कमजोर और बीमार लोगों को ही निशाना नहीं बना रही, बल्कि कामकाजी उम्र के लोगों पर भी भारी पड़ रही है।
पेरिस और उसके आसपास के इलाके (इले-दे-फ्रांस) में हालात सबसे खराब रहे, जहां सामान्य मौतों के मुकाबले 80 से 81 प्रतिशत अधिक मौतें दर्ज की गईं। तंग अपार्टमेंट्स, कंक्रीट के जंगल और कूलिंग सिस्टम की कमी ने राजधानी को एक भट्टी में बदल दिया।
क्या यूरोप की इमारतें अब रहने लायक नहीं रहीं
यूरोपीय देशों की वास्तुकला और शहर का ढांचा सदियों से ठंड को रोकने के हिसाब से बनाया गया है। चौड़ी कंक्रीट की दीवारें, बड़ी खिड़कियां और इंसुलेशन जो गर्मी को अंदर ही रोककर रखता है—यह सब ठंड के दिनों में तो मददगार होता है, लेकिन जब बाहर का तापमान 40 डिग्री पहुंच जाए तो यही घर ओवन बन जाते हैं।
फ्रांस में ज्यादातर लोग अपने घरों में एयर कंडीशनर इस्तेमाल नहीं करते। इसे पर्यावरण के लिए नुकसानदेह और अनावश्यक माना जाता था। लेकिन अब जब लगातार हर साल गर्मी रिकॉर्ड तोड़ रही है, तो यह सोच लोगों की जान पर भारी पड़ रही है।
गर्मी से होने वाली मौतें केवल हीटस्ट्रोक या डिहाइड्रेशन तक सीमित नहीं होतीं। जब शरीर का तापमान लंबे समय तक बढ़ा रहता है, तो दिल, फेफड़े और गुर्दे पर भारी दबाव पड़ता है। जिन लोगों को पहले से कोई बीमारी होती है, उनका शरीर इस तनाव को झेल नहीं पाता।
क्या किया जाना चाहिए
यह संकट अब सिर्फ मौसम विज्ञान का विषय नहीं रहा, यह एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल है। अगर हमें और आपको आने वाले समय में ऐसी आपदाओं से बचना है तो तुरंत कुछ कदम उठाने होंगे।
शहरों में हरियाली का दायरा बढ़ाना सबसे पहली जरूरत है। कंक्रीट के ढांचे गर्मी को सोखते हैं, जबकि पेड़ और पार्क तापमान को 2 से 4 डिग्री तक कम कर सकते हैं।
इमारतों के निर्माण के नियमों को बदलना होगा। सिर्फ हीटिंग नहीं, बल्कि पैसिव कूलिंग तकनीक को हर नए घर का हिस्सा बनाना अनिवार्य करना होगा।
बुजुर्गों और अकेले रहने वाले लोगों के लिए स्थानीय स्तर पर सहायता तंत्र तैयार करना होगा। जब तापमान खतरनाक स्तर पर पहुंचे, तो उनके लिए कम्युनिटी कूलिंग सेंटर्स तक पहुंच आसान बनाई जाए।
गर्मी को अब सामान्य मौसम बदलाव मानकर नजरअंदाज करना जानलेवा साबित हो रहा है। फ्रांस में हुई ये मौतें पूरे विश्व के लिए एक सीधी चेतावनी हैं।